वर्ष 2017 में पंजाबी भाषा की सर्वोच्चता को लेकर हुये विरोध की तस्वीरों को वर्तमान किसान आंदोलन से जोड़कर वायरल किया जा रहा है।

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वर्तमान में दिल्ली के सिंघू बोर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन के चलते सोशल मंचो पर कई पुरानी तस्वीरों को किसान आंदोलन से जोड़कर वायरल किया जा रहा है। इसी बीच एक तस्वीर इंटरनेट पर काफी साझा की जा रही है, यह तस्वीर 8 तस्वीरों को जोड़ कर बनाई गई है, जिसमें आप एक शख्स को हाइवे पर लगे साइनबोर्डों पर हिंदी और अंग्रेजी भाषा में लिखे शहरों के नाम पर कालिक पोतते हुये देख सकते हैं। इस तस्वीर को साथ जो दावा वायरल हो रहा है, उसके मुताबिक किसान आंदोलन के तहत पंजाब में लोग साइन बोर्ड पर से हिंदी भाषा को हटा रहे है।

वायरल हो रहे पोस्ट के शीर्षक में लिखा है,

 जिओ के बाद अब इनको हिंदी भी नही चाईए। कैसा आंदोलन है ये ???

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अनुसंधान से पता चलता है कि…

फैक्ट क्रेसेंडो ने जाँच के दौरान पाया कि वायरल हो रही तस्वीर वर्ष 2017 की है जब पंजाब में दल खालसा व अन्य दलों ने साइन बोर्ड पर पंजाबी भाषा को हिंदी व अंग्रेज़ी से ऊपर लिखने की मांग की थी। इन तस्वीरों का वर्तमान किसान आंदोलन से कोई संबन्ध नहीं है।

जाँच की शुरुवात हमने वायरल हो रही इस तस्वीरों के संकलन को गूगल रीवर्स इमेज सर्च करने से की, परिणाम में हमें एक ट्वीट मिला जिसमें इस तस्वीरों के संकलन को प्रकाशित किया गया है। ट्वीट के शीर्षक में लिखा है, 

किसान आंदोलन के नाम पर जो हिंदी हटाने वाली फोटो आज वायरल की जा रही हैं वे 2017 की हैं। इसे आंदोलन के साथ न जोड़ें। ये फोटो 2017 के प्रोटेस्ट के हैं जिनमे मांग की गई थी कि साइनबोर्ड पर सबसे ऊपर पंजाबी होनी चाहिए, ये एक और फर्जी प्रोपोगेंडा है जिसे जानबूझ कर फैलाया जा रहा है।“ यह ट्वीट इस वर्ष 9 जनवरी को किया गया है।

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इसके पश्चात उपरोक्त जानकारी को ध्यान में रखते हुए हमने गूगल पर और अधिक शोध करते हुये कीवर्ड सर्च किया तो हमें २०१७ के कई समाचार लेख मिले जो इस प्रकरण के बारे में जानकारी दे रहे थे। पंजाब सिख संगत के समाचार लेख में जानकारी दी गयी है कि सार्वजनिक निर्माण विभाग (पी.डब्लू.डी) ने हाइवे पर लगे सभी साइन बोर्ड पर पंजाबी को पहले लिखने की मांग को स्वीकार किया था व 23 अक्टूबर 2017 से पंजाबी भाषा सबसे ऊपरे लिखने का काम शुरु कर दिया था। ये फैसला तब लिया गया जब शिरोमनी अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को अपनी मांगों को लेकर एक पत्र लिखा था।

यह समाचार लेख 23 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित किया गया था।

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हमें सिख सियासत न्यूज़ नामक एक और समाचार लेख मिला जिसके मुताबिक 21 अक्टूबर 2017 में पंजाब में साइन बोर्ड पर हिंदी व अंग्रेज़ी भाषा में लिखे गये नाम पर काला रंग लगाया गया था। इस समाचार लेख में इस मामले में दल खालसा नेता हरदीप सिंह मेहराज और लखबीर सिंह की गिरफ्तारी के बारे में जानकारी दी गयी है।

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हमें यूटूयूब पर कई वीडियो मिले जिनमें हम वायरल हो रही तस्वीरों के संकलन को देख सकते है। 

खालसा फोर्स इंटरनेश्नले नामक एक यूट्यूब चैनल ने एक वीडियो प्रसारित किया है। यह वीडियो 1.06.37 घंटों का वीडियो है, जो 21 अक्टूबर 2017 को प्रसारित किया गया है व इसके शीर्षक में लिखा है, “देखिए, पंजाब में, हिंदी के बोर्ड काले होने लगे हैं। पूरे पंजाब में, जहाँ भी आप हिंदी या अंग्रेजी का बोर्ड देखते हैं, तो उसे एक काला रंग लगा दें।“

वायरल हो रही तस्वीर में दिख रहे दृष्य को आप इस वीडियो में 24.45 मिनट से आगे तक देख सकते है।

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एक अन्य यूट्यूब चैनल जिसका नाम खालसा न्यूज़ नेटवर्क है ने अपने चैनल पर एक वीडियो प्रसारित किया था जो 1.51 मिनटों का है। वीडियो के शीर्षक में लिखा है, “पंजाब में केवल पंजाबी ही मेरी मातृभाषा है, और इसके नीचे दी गयी जानकारी में लिखा है, “पूरे पंजाब में हिंदी, अंग्रेजी और कालिख अभियान। सभी से अपील है कि इस अभियान का समर्थन करें !!! वीडियो देखें और शेयर करें मेरी मातभाषा पंजाबी है।“ यह वीडियो भी 21 अक्टूबर 2017 को प्रसारित किया गया था।

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उपरोक्त खबर की जानकारी आपको अकाली अकाल चैनलन्यूज़18 पंजाब/हरियाणा/हिमाचल के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित किये गये वीडियो में भी देख सकते है।

आर्काइव लिंक | आर्काइव लिंक

ये दोनो ही वीडियो अक्टूबर 2017 में प्रसारित किये गये थे।

इसके पश्चात हमने सिख सियासत न्यूज़ के संपादक परमजीत सिंह से संपर्क किया व उनसे उपरोक्त दी गयी जानकारी के बारे में अधिक स्पष्टता हासिल करने की कोशिश की तो उन्होंने हमें बताया कि, 

“ वर्तमान किसान आंदोलनों से जोड़ जो सन्देश वायरल हो रहा है वो सरासर गलत है। वायरल तस्वीरें २०१७ से हैं जब नेश्नल हाइवे अथोरिटी ऑफ इंडिया ने पंजाब में कुछ नयी रोड़ बनायी थी और उन रोड पर जो साइन बोर्ड लगे हुए थे उनपर हिंदीं/अंग्रेजी भाषा में जो नाम थे वे पंजाबी से ऊपर लिखे हुए थे, तो लोगों ने इसका विरोध किया व कहा की जो स्थानीय भाषा है उसे ऊपर लिखना चाहिए, उसके बाद हिंदी फिर अंग्रेजी लिखी जानी चाहिए। उन लोगों को हिंदी या अंग्रेजी भाषा साइन बोर्ड पर होने से कोई ऐतराज़ नहीं था। परंतु लोगों की मांगे पूरी नहीं होने पर अक्टूबर 2017 में कार्यकर्ताओं ने रोड़ के जिन साइन बोर्ड पर हिंदी व अंग्रेज़ी भाषा पंजाबी भाषा से ऊपर लिखी गयी थी, उनपर काला रंग लगाया, औऱ जिन साइन बोर्ड पर पंजाबी भाषा सबसे ऊपर लिखी गयी थी, उनको आंदोलनकारीयों कार्यकर्ताओं ने कुछ नहीं किया। इसके बाद एन.एच.ए.आई ने सभी साइन बोर्ड पर सही क्रम में भाषा का इस्तेमाल किया, जैसे पहली पंजाबी भाषा लिखी गयी, फिर हिंदी और आखिर में अंग्रेजी भाषा लिखी गयी।“  

उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलनकारियों को हिंदी भाषा से कोई परेशानी नहीं थी, वे बस पंजाबी भाषा, जो की वहाँ की स्थानीय भाषा है, उसे साइन बोर्ड में ऊपर लिखवाना चाहते थे।

तदनंतर परमजीत सिंह की मदद से हमने दल खालसा के नेता हरदीप सिंह मेहराज से संपर्क साधा व उनसे अधिक जानकारी हासिल करने की कोशिश की, तो उन्होंने हमें बताया कि, 

“वायरल हो रही तस्वीरें चार वर्ष पुरानी है, जब हमने हमारी मातृभाषा पंजाबी के लिए आंदोलन किया था। हम सभी भाषाओं का आदर करते है, परंतु चूँकि पंजाबी हमारी स्थानीय भाषा है, हम चाहते थे कि वह रोड पर लगे सभी साइन बोर्ड में दूसरी भाषाओं से ऊपर लिखी जाये और उसके नीचे कोई भी भाषा लिखी हो, उससे हमें कोई परेशानी नहीं है। हमारा मानना यह है कि मातृभाषा सबसे पहले होनी चाहिए, जितनी भी देश की दूसरी भाषाएं है, हम उन सबका सतकार करतें है। वायरल हो रही तस्वीरें 21 अक्टूबर 2017 की है। इस आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों पर 15-20 एफ.आई.आर भी हुई थी। आंदोलन के दौरान हमने मांग की थी कि साइन बोर्ड पर पहले पंजाबी, फिर हिंदी और फिर अंग्रेज़ी होनी चाहिए।“

आपको बता दें कि यह आंदोलन हरदीप सिंह मेहराज के नेतृत्व में हुआ था।

हरदीप सिंह मेहराज ने हमें इस मामले की कुछ तस्वीरें व दस्तावेजों की तस्वीरें भी उपलब्ध करायी।

निष्कर्ष: तथ्यों की जाँच के पश्चात हमने पाया है कि किसान आंदोलनों के साथ जोड़ वायरल हो रहा उपरोक्त दावा गलत है। वायरल हो रही तस्वीर वर्ष 2017 की है जब पंजाब में दल खालसा व अन्य दलों ने साइन बोर्ड पर पंजाबी भाषा को हिंदी व अंग्रेज़ी से ऊपर लिखने की मांग की थी। इन तस्वीरों का किसान आंदोलन से कोई संबन्ध नहीं है।

फैक्ट क्रेसेंडो द्वारा किये गये अन्य फैक्ट चेक पढ़ने के लिए क्लिक करें :

१. कोलकाता से प्राइड परेड के तस्वीर को जेएनयू छात्रों द्वारा हिन्दू संस्कृति के विरोध का बता वायरल किया जा रहा है|

२. भा.ज.पा सांसद रमेश बिधूड़ी ने किसानों को गाली नहीं दी, “ठलवा” शब्द को गाली बता वायरल किया जा रहा है।

३. पुणे रेल्वे स्टेशन के मूल प्लेटफॉर्म टिकट को एडिट कर गलत दावे के साथ वायरल किया जा रहा है।

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Title:वर्ष 2017 में पंजाबी भाषा की सर्वोच्चता को लेकर हुये विरोध की तस्वीरों को वर्तमान किसान आंदोलन से जोड़कर वायरल किया जा रहा है।

Fact Check By: Rashi Jain 

Result: False


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